Saturday, October 25, 2008

दीपावली की शुभकामनाएँ

उजालों की चाह में उड़ कर सूर्य से
मन का दिया जला लूँ ज़रा

अमावास के अँधेरों के लिये
रौशन उजाले सँभाल लूँ ज़रा

कोई छू ले तो लौ से उजाले
उसमें भी कर दूँ मैं ज़रा

रात ऐसी है यह चाँद के उजाले भी नहीं
दिये से दिये जलाकर अँधेरों को बुझा दे ज़रा

Monday, September 22, 2008

जनहित में जारी ....

सफल नौकरी करने के कुछ तरीके...

बने रहो पगले, काम करे अगले !!
काम से रहो गुल, तनख्वाह पाओ फुल !!
मत लो टेंशन वरना परिवार पाएगा पेंशन !!
काम से डरो नहीं, काम को करो नहीं !!
काम करो न करो, काम की फिक्र जरूर करो !!
फिक्र करो न करो, पर उसका जिक्र जरूर करो !!
समस्त ऑफिस एम्प्लोईज़ को समर्पित ...

Friday, September 12, 2008

काँच की बरनी और दो कप चाय

जीवन में जब सब कुछ एक साथ और जल्दी-जल्दी करने की इच्छा होती है, सब कुछ तेजी से पा लेने की इच्छा होती है, और हमें लगने लगता है कि दिन के चौबीस घंटे भी कम पड़ते हैं, उस समय ये बोध कथा, "काँच की बरनी और दो कप चाय" हमें याद आती है ।दर्शनशास्त्र के एक प्रोफ़ेसर कक्षा में आये और उन्होंने छात्रों से कहा कि वे आज जीवन का एक महत्वपूर्ण पाठ पढाने वाले हैं...

उन्होंने अपने साथ लाई एक काँच की बडी़ बरनी (जार) टेबल पर रखा और उसमें टेबल टेनिस की गेंदें डालने लगे और तब तक डालते रहे जब तक कि उसमें एक भी गेंद समाने की जगह नहीं बची...

उन्होंने छात्रों से पूछा - क्या बरनी पूरी भर गई ? हाँ... आवाज आई...फ़िर प्रोफ़ेसर साहब ने छोटे-छोटे कंकर उसमें भरने शुरु किये, धीरे-धीरे बरनी को हिलाया तो काफ़ी सारे कंकर उसमें जहाँ जगह खाली थी, समा गये, फ़िर से प्रोफ़ेसर साहब ने पूछा, क्या अब बरनी भर गई है, छात्रों ने एक बार फ़िर हाँ.. कहा अब प्रोफ़ेसर साहब ने रेत की थैली से हौले-हौले उस बरनी में रेत डालना शुरु किया, वह रेत भी उस जार में जहाँ संभव था बैठ गई, अब छात्र अपनी नादानी पर हँसे...

फ़िर प्रोफ़ेसर साहब ने पूछा, क्यों अब तो यह बरनी पूरी भर गई ना ? हाँ.. अब तो पूरी भर गई है.. सभी ने एक स्वर में कहा..सर ने टेबल के नीचे से चाय के दो कप निकालकर उसमें की चाय जार में डाली, चाय भी रेत के बीच में स्थित थोडी़ सी जगह में सोख ली गई...

प्रोफ़ेसर साहब ने गंभीर आवाज में समझाना शुरु किया - इस काँच की बरनी को तुम लोग अपना जीवन समझो... टेबल टेनिस की गेंदें सबसे महत्वपूर्ण भाग अर्थात भगवान, परिवार, बच्चे, मित्र, स्वास्थ्य और शौक हैं, छोटे कंकर मतलब तुम्हारी नौकरी, कार, बडा़ मकान आदि हैं, और रेत का मतलब और भी छोटी-छोटी बेकार सी बातें, मनमुटाव, झगडे़ है..अब यदि तुमने काँच की बरनी में सबसे पहले रेत भरी होती तो टेबल टेनिस की गेंदों और कंकरों के लिये जगह ही नहीं बचती, या कंकर भर दिये होते तो गेंदें नहीं भर पाते, रेत जरूर आ सकती थी...ठीक यही बात जीवन पर लागू होती है...

यदि तुम छोटी-छोटी बातों के पीछे पडे़ रहोगे और अपनी ऊर्जा उसमें नष्ट करोगे तो तुम्हारे पास मुख्य बातों के लिये अधिक समय नहीं रहेगा... मन के सुख के लिये क्या जरूरी है ये तुम्हें तय करना है । अपने बच्चों के साथ खेलो, बगीचे में पानी डालो, सुबह पत्नी के साथ घूमने निकल जाओ, घर के बेकार सामान को बाहर निकाल फ़ेंको, मेडिकल चेक-अप करवाओ..टेबल टेनिस गेंदों की फ़िक्र पहले करो, वही महत्वपूर्ण है... पहले तय करो कि क्या जरूरी है... बाकी सब तो रेत है..छात्र बडे़ ध्यान से सुन रहे थे..

अचानक एक ने पूछा, सर लेकिन आपने यह नहीं बताया कि "चाय के दो कप" क्या हैं ?प्रोफ़ेसर मुस्कुराये, बोले.. मैं सोच ही रहा था कि अभी तक ये सवाल किसी ने क्यों नहीं किया... इसका उत्तर यह है कि, जीवन हमें कितना ही परिपूर्ण और संतुष्ट लगे, लेकिन अपने खास मित्र के साथ दो कप चाय पीने की जगह हमेशा होनी चाहिये ।

Thursday, August 28, 2008

पापा आई लव यू !

जीवन के कुछ पल होते है जिसे आप जिन्दगी भर नहीं भुला सकते। ऐसा ही एक पल मेरी जिंदगी मैं आज आया। आज मैं और कुछ ऑफिस के दोस्त लंच कर रहे थे। मेरे मित्र संजय जी के सच्चाई से करीब एक घटना सुनाई।


एक व्यक्ति ने नई कार खरीदी। एक दिन वो अपनी चार वर्ष की बेटी के साथ घुमने के लिए निकला। निकलते समय उसने अपनी कार पे कपड़ा से सफाई करने लगा। उसकी बेटी ने खेलते-खेलते एक पत्थर से उसने कार पे कुछ लिख दिया, उस पर आदमी को गुस्सा आ गया। उसने पास में पड़े डंडे से उसके हाथो पर डंडे मारे, जिससे उसकी हाथो की उंगलियों में काफी चोट पहुची।



उसको अस्पताल ले जाना पड़ा। डॉक्टर ने कहा केस बहुत गंभीर है, उंगलियों बहुत नुकसान पंहुचा है। काफी इलाज कराने के बाद भी ठीक नहीं हुआ तो डॉक्टर ने कहा की बच्ची की उंगलियों काटनी पड़ेगी।
एक दिन बाद, उस ओपरेशन में उस बच्ची की उंगलियों काट दी गई। ओपरेशन के एक घंटे बाद जब बच्ची को होश आया तो उसने अपने पापा से पूछा, पापा मेरी उंगलियों कब वापस आएगी। अपनी गलती पर सर झुकाते हुए अपने किए पर पछता रहा और बार-बार पूछने पर उस व्यक्ति ने अपनी बेटी को सच्चाई बताई की वो अब कभी नहीं आएगी।



इस पर बेटी ने बहुत ही मासूमियत से बताया की उस दिन आपकी नई कार पर मैंने पत्थर से लिखा था "पापा आई लव यू!".

Wednesday, August 27, 2008

खुशियों और आंसुओं का बाजार

जेड गुडी को लेकर एक बार फिर चर्चाओं का बाजार गर्म है। कुछ महीने पहले ऐसी ही चर्चा निहिता विश्वास व चार्ल्स शोभराज को लेकर थी। मार्किटिंग के इस जमाने में तिल का ताड़ बनते देर नहीं लगती। कई बार छोटी-छोटी बातों को भी इतनी अहमियत दे दी जाती है कि पूरी दुनिया में उन्हीं की चर्चा होती रहती है। जाहिर है, आज बाजार में केवल सामान ही नहीं, इमोशंस भी बिकते हैं

हार्वर्ड बिजनेस स्कूल में लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचने की कोई तरकीब नहीं सिखाई जाती और न ही मार्किटिंग के लॉन्ग डिस्टन्स कोसेर्ज में इसकी शिक्षा दी जाती है। ये छोटी-छोटी बातें समाज के बीच से ही निकलती हैं और देखते ही देखते दुनिया में छा जाती हैं। मॉडर्न मार्किटिंग में लोगों को अपने प्रॉडक्ट या ब्रैंड की ओर खींचने के रूल्स बदल गए हैं। आज के उपभोक्तावादी युग में दुनिया एक बाजार में तब्दील हो गई है, जहां हर कोई अपने-अपने ढंग से अपनी मार्किटिंग करने की कोशिश करता है। अब दुनिया में केवल सामान ही नहीं, भावनाएं भी बिकती हैं।

साभार: इकनोमिक टाईम्स